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Showing posts from July, 2017

गोरख पाण्डेय की कविताएँ

तमाम विद्रूपताओं और अंधे संघर्षों के बावजूद जीवन में उम्मीद और प्यार के पल बिखरे मिलते हैं. इन्हीं पलों को बुनने वाले कवि का नाम है गोरख पाण्डेय. इनकी कविताओं में जीवन और समाज की सच्चाईयाँ अपनी पूरी कुरूपता के साथ मौजूद हैं लेकिन इनके बीच जीवन का सौन्दर्य आशा की किरण बनकर निखर आता है. 

प्रस्तुत हैं सौन्दर्य और संघर्ष के कवि गोरख पाण्डेय की कुछ कविताएँ-
सात सुरों में पुकारता है प्यार  (रामजी राय से एक लोकगीत सुनकर)
माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
जोगी शिरीष तले मुझे मिला
सिर्फ एक बाँसुरी थी उसके हाथ में आँखों में आकाश का सपना पैरों में धूल और घाव
गाँव-गाँव वन-वन भटकता है जोगी जैसे ढूँढ रहा हो खोया हुआ प्यार भूली-बिसरी सुधियों और नामों को बाँसुरी पर टेरता
जोगी देखते ही भा गया मुझे माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
नहीं उसका कोई ठौर ठिकाना नहीं ज़ात-पाँत दर्द का एक राग गाँवों और जंगलों को गुंजाता भटकता है जोगी कौन-सा दर्द है उसे माँ क्या धरती पर उसे कभी प्यार नहीं मिला? माँ, मैं जोगी के साथ जाऊँगी
ससुराल वाले आएँगे लिए डोली-कहार बाजा-गाजा बेशक़ीमती कपड़ों में भरे दूल्हा राजा हाथी-घोड़ा शान-शौकत तुम संकोच मत करना, माँ अगर वे गुस…