Sunday 7 September 2014

शेखर जोशी की कहानी - दाज्यू

10 सितंबर, 1932 को अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के गाँव ओलियागाँव के एक किसान परिवार में जन्मे शेखर जोशी कथा-लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानते हैं। सन् 1953 में लिखी उनकी पहली कहानी दाज्यूकाफी चर्चित हुई। इस कालजयी कहानी का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पर चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी ने फिल्म का निर्माण किया।

शेखर जोशी जी का आभार कि उन्होंने यह कहानी यहाँ प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।

दाज्यू

          चौक से निकल कर बायीं ओर जो बड़े साइनबोर्ड वाला छोटा कैफे है वहीं जगदीश बाबू ने उसे पहली बार देखा था। गोरा-चिट्टा रंग, नीली शफ्फ़ाफ आँखें, सुनहरे बाल और चाल में एक अनोखी मस्ती- पर शिथिलता नहीं। कमल के पत्ते पर फिसलती हुई पानी की बूँद की सी फुर्ती। आँखों की चंचलता देख कर उसकी उम्र का अनुमान केवल नौ-दस वर्ष ही लगाया जा सकता था और शायद यही उम्र उसकी रही होगी।
                अधजली सिगरेट का एक लंबा कश खींचते हुए जब जगदीश बाबू ने कैफे में प्रवेश किया तो वह एक मेज पर से प्लेटें उठा रहा था और जब वे पास ही कोने की टेबल पर बैठे तो वह सामने था। मानो, घंटों से उनकी, उस स्थान पर आने वाले व्यक्ति की, प्रतीक्षा कर रहा हो। वह कुछ बोला नहीं। हाँ, नम्रता प्रदर्शन के लिए थोड़ा झुका और मुस्कराया भर था, पर उसके इसी मौन में जैसे सारा मीनूसमाहित था। सिंगल चायका आर्डर पाने पर वह एक बार पुन: मुस्करा कर चल दिया और पलक मारते ही चाय हाजिर थी।
                 
मनुष्य की भावनाएँ बड़ी विचित्र होती हैं। निर्जन, एकांत स्थान में निस्संग होने पर भी कभी-कभी आदमी एकाकी अनुभव नहीं करता। लगता है, उस एकाकीपन में भी सब कुछ कितना निकट है, कितना अपना है। परंतु इसके विपरीत कभी-कभी सैकड़ों नर-नारियों के बीच जनरवमय वातावरण में रह कर भी सूनेपन की अनुभूति होती है। लगता है, जो कुछ है वह पराया है, कितना अपनत्वहीन! पर यह अकारण ही नहीं होता। उस एकाकीपन की अनुभूति, उस अलगाव की जड़ें होती हैं- बिछोह या विरक्ति की किसी कथा के मूल में।
                जगदीश बाबू दूर देश से आए हैं, अकेले हैं। चौक की चहल-पहल, कैफे के शोरगुल में उन्हें लगता है, सब कुछ अपनत्वहीन है। शायद कुछ दिनों रहकर, अभ्यस्त हो जाने पर उन्हें इसी वातावरण में अपनेपन की अनुभूति होने लगे। पर आज तो लगता है यह अपना नहीं, अपनेपन की सीमा से दूर, कितना दूर है! और तब उन्हें अनायास ही याद आने लगते हैं अपने गाँव-पड़ोस के आदमी, स्कूल-कालेज के छोकरे, अपने निकट शहर के कैफे-होटल…!
 ’
चाय शाब!
 
जगदीश बाबू ने राखदानी में सिगरेट झाड़ी। उन्हें लगा, इन शब्दों की ध्वनि में वही कुछ है जिसकी रिक्तता उन्हें अनुभव हो रही है। और उन्होंने अपनी शंका का समाधान कर लिया-
 ’
क्या नाम है तुम्हारा?’
 ’
मदन।
 ’
अच्छा, मदन! तुम कहाँ के रहने वाले हो?’
 ’
पहाड़ का हूँ, बाबूजी!
 ’
पहाड़ तो सैकड़ों हैं- आबू, दार्जिलिंग, मंसूरी, शिमला, अल्मोड़ा! तुम्हारा गाँव किस पहाड़ में है?’
 
इस बार शायद उसे पहाड़ और जिले का भेद मालूम हो गया। मुस्कुराकर बोला-
 ’
अल्मोड़ा, शाब अल्मोड़ा।
 ’
अल्मोड़ा में कौन-सा गाँव है?’ विशेष जानने की गरज से जगदीश बाबू ने पूछा।
                 
इस प्रश्न ने उसे संकोच में डाल दिया। शायद अपने गाँव की निराली संज्ञा के कारण उसे संकोच हुआ था, इस कारण टालता हुआ सा बोला, ‘वह तो दूर है शाब अल्मोड़ा से पंद्रह-बीस मील होगा।
 ’
फिर भी, नाम तो कुछ होगा ही।जगदीश बाबू ने जोर देकर पूछा।
 ’
डोट्यालगोंवह सकुचाता हुआ-सा बोला।
               
जगदीश बाबू के चेहरे पर पुती हुई एकाकीपन की स्याही दूर हो गई और जब उन्होंने मुस्करा कर मदन को बताया कि वे भी उसके निकटवर्ती गाँव ‘……..’  के रहने वाले हैं तो लगा जैसे प्रसन्नता के कारण अभी मदन के हाथ से ट्रे गिर पड़ेगी। उसके मुँह से शब्द निकलना चाह कर भी न निकल सके। खोया-खोया सा वह मानो अपने अतीत को फिर लौट-लौट कर देखने का प्रयत्न कर रहा हो।
         अतीत- गाँवऊँची पहाड़ियाँनदीईजा (मां)बाबादीदीभुलि (छोटी बहन)दाज्यू (बड़ा भाई)…!
मदन को जगदीश बाबू के रूप में किसकी छाया निकट जान पड़ी! ईजा?- नहीं, बाबा?- नहीं, दीदी,…भुलि?- नहीं, दाज्यू? हाँ, दाज्यू!
          दो-चार ही दिनों में मदन और जगदीश बाबू के बीच की अजनबीपन की खाई दूर हो गई। टेबल पर बैठते ही मदन का स्वर सुनाई देता-
दाज्यू, जैहिन्न
दाज्यू, आज तो ठंड बहुत है।
दाज्यू, क्या यहाँ भी ह्यूं’ (हिम) पड़ेगा।
दाज्यू, आपने तो कल बहुत थोड़ा खाना खाया।तभी किसी और से बॉय की आवाज पड़ती और मदन उस आवाज की प्रतिध्वनि के पहुँचने से पहले ही वहाँ पहुँच जाता! आर्डर लेकर फिर जाते-जाते जगदीश बाबू से पूछता, ‘दाज्यू कोई चीज?’
पानी लाओ।
लाया दाज्यू’, दूसरी टेबल से मदन की आवाज सुनाई देती।
मदन दाज्यूशब्द को उतनी ही आतुरता और लगन से दुहराता जितनी आतुरता से बहुत दिनों के बाद मिलने पर माँ अपने बेटे को चूमती है।
           कुछ दिनों बाद जगदीश बाबू का एकाकीपन दूर हो गया। उन्हें अब चौक, केफे ही नहीं सारा शहर अपनेपन के रंग में रंगा हुआ सा लगने लगा। परंतु अब उन्हें यह बार-बार दाज्यू कहलाना अच्छा नहीं लगता और यह मदन था कि दूसरी टेबल से भी दाज्यू’…
मदन! इधर आओ।
आया दाज्यू!
दाज्यूशब्द की आवृत्ति पर जगदीश बाबू के मध्यमवर्गीय संस्कार जाग उठे- अपनत्व की पतली डोरी अहं की तेज धार के आगे न टिक सकी।
दाज्यू, चाय लाऊँ?’
चाय नहीं, लेकिन यह दाज्यू-दाज्यू क्या चिल्लाते रहते हो दिन रात। किसी की प्रेस्टिजका ख्याल भी नहीं है तुम्हें?’
जगदीश बाबू का मुँह क्रोध के कारण तमतमा गया, शब्दों पर अधिकार नहीं रह सका। मदन प्रेस्टिजका अर्थ समझ सकेगा या नहीं, यह भी उन्हें ध्यान नहीं रहा, पर मदन बिना समझाए ही सब कुछ समझ गया था।
           मदन को जगदीश बाबू के व्यवहार से गहरी चोट लगी। मैनेजर से सिरदर्द का बहाना कर वह घुटनों में सर दे कोठरी में सिसकियाँ भर-भर रोता रहा। घर- गाँव से दूर, ऐसी परिस्थिति में मदन का जगदीश बाबू के प्रति आत्मीयता-प्रदर्शन स्वाभाविक ही था। इसी कारण आज प्रवासी जीवन में पहली बार उसे लगा जैसे किसी ने उसे ईजा की गोदी से, बाबा की बाँहों के, और दीदी के आँचल की छाया से बलपूर्वक खींच लिया हो।
          परंतु भावुकता स्थायी नहीं होती। रो लेने पर, अंतर की घुमड़ती वेदना को आँखों की राह बाहर निकाल लेने पर मनुष्य जो भी निश्चय करता है वे भावुक क्षणों की अपेक्षा अधिक विवेकपूर्ण होते हैं।
मदन पूर्ववत काम करने लगा।
          दूसरे दिन कैफे जाते हुए अचानक ही जगदीश बाबू की भेंट बचपन के सहपाठी हेमंत से हो गई। कैफे में पहुँचकर जगदीश बाबू ने इशारे से मदन को बुलाया परंतु उन्हें लगा जैसे वह उनसे दूर-दूर रहने का प्रयत्न कर रहा हो। दूसरी बार बुलाने पर ही मदन आया। आज उसके मुँह पर वह मुस्कान न थी और न ही उसने क्या लाऊँ दाज्यूकहा। स्वयं जगदीश बाबू को ही कहना पड़ा, ‘दो चाय, दो ऑमलेटपरंतु तब भी लाया दाज्यूकहने की अपेक्षा लाया शाकहकर वह चल दिया। मानों दोनों अपरिचित हों।
शायद पहाडिय़ा है?’ हेमंत ने अनुमान लगाकर पूछा।
हाँ’, रूखा सा उत्तर दे दिया जगदीश बाबू ने और वार्तालाप का विषय ही बदल दिया।
मदन चाय ले आया था।
क्या नाम है तुम्हारा लड़के?’ हेमंत ने अहसान चढ़ाने की गरज से पूछा।
          कुछ क्षणों के लिए टेबुल पर गंभीर मौन छा गया। जगदीश बाबू की आँखें चाय की प्याली पर ही रह गईं। मदन की आँखों के सामने विगत स्मृतियाँ घूमने लगींजगदीश बाबू का एक दिन ऐसे ही नाम पूछनाफिरदाज्यू आपने तो कल थोड़ा ही खायाऔर एक दिन किसी की प्रेस्टिज का खयाल नहीं रहता तुम्हें…’
जगदीश बाबू ने आँखें उठाकर मदन की ओर देखा, उन्हें लगा जैसे अभी वह ज्वालामुखी सा फूट पड़ेगा।
हेमंत ने आग्रह के स्वर में दुहराया, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’
बॉय कहते हैं शाब मुझे।संक्षिप्त-सा उत्तर देकर वह मुड़ गया। आवेश में उसका चेहरा लाल होकर और भी अधिक सुंदर हो गया था।

 http://shabdvyanjana.com/AuthorPost.aspx?id=1003&rid=17

Friday 5 September 2014

नाजिम हिकमत की कविताएँ


मनहूस आज़ादी
तुम बेच देते हो –
अपनी आँखों की सतर्कता, अपने हाथों की चमक. 
तुम गूंथते हो लोइयाँ जिंदगी की रोटी के लिये, 
पर कभी एक टुकड़े का स्वाद भी नहीं चखते
तुम एक गुलाम हो अपनी महान आजादी में खटनेवाले. 
अमीरों को और अमीर बनाने के लिये नरक भोगने की आज़ादी के साथ
तुम आजाद हो! 

जैसे ही तुम जन्म लेते हो, करने लगते हो काम और चिंता, 
झूठ की पवनचक्कियाँ गाड़ दी जाती हैं तुम्हारे दिमाग में. 
अपनी महान आज़ादी में अपने हाथों से थाम लेते हो तुम अपना माथा. 
अपने अन्तःकरण की आजादी के साथ
तुम आजाद हो! 

तुम बेहद प्यार करते हो अपने देश को, 
पर एक दिन, उदाहरण के लिए, एक ही दस्तखत में
उसे अमेरिका के हवाले कर दिया ज़ाता है
और साथ में तुम्हारी महान आज़ादी भी. 
उसका हवाईअड्डा बनने की अपनी आजादी के साथ
तुम आजाद हो! 

तुम्हारा सिर अलग कर दिया गया है धड़ से. 
तुम्हारे हाथ झूलते है तुम्हारे दोनों बगल. 
सड़कों पर भटकते हो तुम अपनी महान आज़ादी के साथ. 
अपने बेरोजगार होने की महान आज़ादी के साथ
तुम आजाद हो! 

वालस्ट्रीट तुम्हारी गर्दन ज़कड़ती है
ले लेती है तुम्हें अपने कब्ज़े में. 
एक दिन वे भेज सकते हैं तुम्हें कोरिया, 
ज़हाँ अपनी महान आजादी के साथ तुम भर सकते हो एक कब्र. 
एक गुमनाम सिपाही बनने की आज़ादी के साथ
तुम आजाद हो! 

तुम कहते हो तुम्हें एक इंसान की तरह जीना चाहिए, 
एक औजार, एक संख्या, एक साधन की तरह नहीं. 
तुम्हारी महान आज़ादी में वे हथकडियाँ पहना देते हैं तुम्हें. 
गिरफ्तार होने, जेल जाने, यहाँ तक कि
फाँसी पर झूलने की अपनी आज़ादी के साथ
तुम आजाद हो. 

तुम्हारे जीवन में कोई लोहे का फाटक नहीं, 
बाँस का टट्टर या टाट का पर्दा तक नहीं. 
आज़ादी को चुनने की जरुरत ही क्या है भला -
तुम आजाद हो! 

सितारों भारी रात के तले बड़ी मनहूस है यह आज़ादी. 

(अनुवाद- दिनेश पोसवाल) 

************************************************

जीने के बारे में

जीना कोई हंसी-मजाक नहीं,
तुम्हें पूरी संजीदगी से जीना चाहिए
मसलन, किसी गिलहरी की तरह
मेरा मतलब जिंदगी से परे और उससे ऊपर
किसी भी चीज की तलाश किये बगैर.
मतलब जिना तुम्हारा मुकम्मल कारोबार होना चाहिए.
जीना कोई मजाक नहीं,
इसे पूरी संजीदगी से लेना चाहिए,
इतना और इस हद तक
कि मसलन, तुम्हारे हाथ बंधे हों पीठ के पीछे
पीठ सटी हो दीवार से,
या फिर किसी लेबोरेटरी के अंदर
सफ़ेद कोट और हिफाज़ती चश्मे में ही,
तुम मर सकते हो लोगों के लिए—
उन लोगों के लिए भी जिनसे कभी रूबरू नहीं हुए,
हालांकि तुम्हे पता है जिंदगी 
सबसे असली, सबसे खूबसूरत शै है.
मतलब, तुम्हें जिंदगी को इतनी ही संजीदगी से लेना है
कि मिसाल के लिए, सत्तर की उम्र में भी
तुम रोपो जैतून के पेड़—
और वह भी महज अपने बच्चों की खातिर नहीं,
बल्कि इसलिए कि भले ही तुम डरते हो मौत से—
मगर यकीन नहीं करते उस पर,
क्योंकि जिन्दा रहना, मेरे ख्याल से, मौत से कहीं भारी है.

ll

मान लो कि तुम बहुत ही बीमार हो, तुम्हें सर्जरी की जरूरत है—
कहने का मतलब उस सफ़ेद टेबुल से
शायद उठ भी न पाओ.
हालाँकि ये मुमकिन नहीं कि हम दुखी न हों
थोड़ा पहले गुजर जाने को लेकर,
फिर भी हम लतीफे सुन कर हँसेंगे,
खिड़की से झांक कर बारीश का नजारा लेंगे
या बेचैनी से
ताज़ा समाचारों का इंतज़ार करेंगे….
फर्ज करो हम किसी मोर्चे पर हैं—
रख लो, किसी अहम चीज की खातिर.
उसी वक्त वहाँ पहला भारी हमला हो,
मुमकिन है हम औंधे मुंह गिरें, मौत के मुंह में.
अजीब गुस्से के साथ, हम जानेंगे इसके बारे में,
लेकिन फिर भी हम फिक्रमंद होंगे मौत को लेकर
जंग के नतीजों को लेकर, जो सालों चलता रहेगा.
फर्ज करो हम कैदखाने में हों
और वाह भी तक़रीबन पचास की उम्र में,
और रख लो, लोहे के दरवाजे खुलने में 
अभी अठारह साल और बाकी हों
फिर भी हम जियेंगे बाहरी दुनिया के साथ,
वहाँ के लोगों और जानवरों, जद्दोजहद और हवा के बीच—
मतलब दीवारों से परे बाहर की दुनिया में,
मतलब, हम जहाँ और जिस हाल में हों,
हमें इस तरह जीना चाहिए जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं.
यह धरती ठंडी हो जायेगी,
तारों के बीच एक तारा
और सबसे छोटे तारों में से एक,
नीले मखमल पर टंका सुनहरा बूटा—
मेरा मतलब है, यह गजब की धरती हमारी.
यह धरती ठंडी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ की एक सिल्ली के मानिंद नहीं
या किसी मरे हुए बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोंखले अखरोट की तरह चारों ओर लुढकेगी
गहरे काले आकाश में…
इस बात के लिये इसी वक्त मातम करना चाहिए तुम्हें
–इस दुःख को इसी वक्त महसूस करना होगा तुम्हें—
क्योंकि दुनिया को इस हद तक प्यार करना जरुरी है
अगर तुम कहने जा रहे हो कि “मैंने जिंदगी जी है”…

(अंग्रेजी से अनुवाद –दिगंबर)

*************************************

आशावाद

कविताएँ लिखता हूँ मैं
वे छप नहीं पातीं
लेकिन छपेंगी वे.
मैं इंतजार कर रहा हूँ खुश-खैरियत भरे खत का
शायद वो उसी दिन पहुँचे जिस दिन मेरी मौत हो
लेकिन लाजिम है कि वो आएगा.
दुनिया पर सरकारों और पैसे की नहीं
बल्कि अवाम की हुकूमत होगी
अब से सौ साल बाद ही सही
लेकिन ये होगा ज़रूर.

(अंग्रेजी से अनुवाद –दिगंबर)

Wednesday 3 September 2014

कटॆ जॊ शीश सैनिक कॆ : गज़ल

कवि-"राज बुन्दॆली"

गज़ल

वफ़ा है ग़र ज़हां मॆं तॊ हमॆं भी आज़माना है ॥
फ़रॆबी है ज़माना ग़र पता सच का लगाना है ॥१॥

कटॆ जॊ शीश सैनिक कॆ सभी सॆ पूछतॆ धड़ वॊ,
बता दॊ हिन्द का कितना हमॆं कर्जा चुकाना है ॥२॥

कहॆं रॊ कर शहीदॊं की मज़ारॊं कॆ सुमन दॆखॊ,
नहीं है लाज सत्ता कॊ फ़कत दामन बचाना है ॥३॥

हमारॆ ख़ून सॆ लथ-पथ, हुयॆ इतिहास कॆ पन्नॆ,
हमॆशा मुल्क की ख़ातिर, हमॆं जीवन लुटाना है ॥४॥

मिलॆ यॆ चन्द वादॆ हैं, हमारॆ खून की कीमत,
शहीदॊं की शहादत पर, यही मरहम लगाना है ॥५॥

शराफ़त की करॆ बातॆं, मग़ज मॆं रंज पालॆ है,
शरीफ़ॊं का तरीका यॆ, बड़ा ही कातिलाना है ॥६॥

चुनौती है तुझॆ तॆरॆ, अक़ीदॆ की इबादत की,
खुलॆ मैदान मॆं आजा, अगर जुर्रत दिखाना है ॥७॥

नहीं दॆतॆ दिखाई अब, यहाँ जॊ लॊग कहतॆ थॆ,
मुहब्बत थी मुहब्बत है, मुहब्बत का ज़माना है ॥८॥

शियासत मौन बैठी है पहन कर चूड़ियाँ दॆखॊ,
शहादत सॆ बड़ा उनकी नज़र मॆं वॊट पाना है ॥९॥

कभी कॊई बताता ही,नहीं है "राज" मुझकॊ यॆ,
हमारॆ दॆश का रुतबा, हुआ अब क्यूँ ज़नाना है ॥१०॥


Tuesday 2 September 2014

जलेस द्वारा आयोजित लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम


                   24अगस्त 2014को कैफ़ी आज़मी सभागार, निशातगंज, लखनऊ में जनवादी लेखक संघ की लखनऊ इकाई के तत्वाधान में वरिष्ठ लेखक एवं संपादक डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव की अध्यक्षता एवं डॉ संध्या सिंह के कुशल सञ्चालन में कवि बृजेश नीरज की काव्यकृति कोहरा सूरज धूपएवं युवा कवि राहुल देव के कविता संग्रह उधेड़बुनका लोकार्पण एवं दोनों कृतियों पर परिचर्चा का कार्यक्रम आयोजित किया गया।

          कार्यक्रम में सर्वप्रथम प्रख्यात समाजवादी लेखक डॉ यू.आर. अनंतमूर्ति को उनके निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गयी। मंचासीन अतिथियों में कवि एवं आलोचक डॉ अनिल त्रिपाठी, जलेस अध्यक्ष डा अली बाकर जैदी, लेखक चंद्रेश्वर, युवा आलोचक अजित प्रियदर्शी ने कार्यक्रम में दोनों कवियों की कविताओं पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए। परिचर्चा में सर्वप्रथम कवयित्री सुशीला पुरी ने क्रमशः बृजेश नीरज एवं राहुल देव के जीवन परिचय एवं रचनायात्रा पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात राहुल देव ने अपने काव्यपाठ में भ्रष्टाचारम उवाच’, ‘अक्स में मैं और मेरा शहर’, ‘हारा हुआ आदमी’, ‘नशा’, ‘मेरे सृजक तू बताशीर्षक कविताओं का वाचन किया। बृजेश नीरज ने अपने काव्यपाठ में तीन शब्द’, ‘क्या लिखूं’, ‘चेहरा’, ‘दीवारकविताओं का पाठ किया।

          परिचर्चा में युवा आलोचक अजित प्रियदर्शी ने राहुल देव की कविताओं पर अपनी बात रखते हुए कहा कि इनकी कविताओं में प्रश्नों की व्यापकता की अनुभूति होती है। यही प्रश्न उनकी उधेड़बुन को प्रकट करते हैं। राहुल अपनी छोटी कविताओं में अधिक सशक्त हैं। राहुल अपनी कविताओं में जीवन को जीने का प्रयास करते हैं। डॉ अनिल त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में सर्वप्रथम श्री बृजेश नीरज की रचनाधर्मिता पर अपने विचार प्रकट किए- बृजेश नीरज की कृति समकालीन कविता के दौर की विशिष्ट उपलब्धि है। उनकी कविताओं में लय, कहन, लेखन की शैली दृष्टिगोचर होती है। वे अपना मुहावरा स्वयं गढ़ते हैं। इस काव्य संग्रह का आना इत्तेफ़ाक हो सकता है किन्तु अब यह समकालीन हिंदी कविता की आवश्यकता है। राहुल की छोटी कविताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। समीक्षक चंद्रेश्वर ने कहा कि राहुल देव की कविताओं में तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग खटकता है। राहुल ने अपनी कविताओं में शब्दों को अधिक खर्च किया है, उन्हें इतना उदार नहीं होना चाहिए। कहीं-कहीं पर अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग हिंदी साहित्य में भाषा की विडंबना को परिलक्षित करता है। बृजेश नीरज संक्षिप्तता के कवि हैं, प्रभावशाली हैं। अपनी पत्नी के नाम को अपने नाम के साथ जोड़कर उन्होंने एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी रचनाधर्मिता सराहनीय है।

          अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कार्यक्रम संयोजक डॉ नलिन रंजन सिंह को साधुवाद देते हुए कहा कि जब मानवीय संवेदनाएं सूखती जा रही हैं ऐसे समय में ऐसी सार्थक बहस का आयोजन एक ऐतिहासिक क्षण है जिसमें श्री नरेश सक्सेना और श्री विनोद दास जैसे गणमान्य साहित्यकार भी उपस्थित हों। राहुल की कृति उधेड़बुनएक युवा कवि के अंतस का प्रतिबिम्ब है। एक छटपटाहट लिए यह संग्रह एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह समाज के बनावटी जीवन को उद्घाटित करता है। उधेड़बुनरोमांटिक प्रोटेस्ट का कविता संग्रह है। बृजेश नीरज की कृति कोहरा, सूरज, धूपमें गंभीरता है। यह एक ऐसे सत्य की खोज़ है जिसमें जीवन के उच्चतर आदर्शों की उद्दामता है, मानवतावाद का बोध कराने की सामर्थ्य है। आज के सन्दर्भों में यह दोनों कृतियाँ महत्त्वपूर्ण और पठनीय हैं।


          अंत में धन्यवाद ज्ञापन डा अली बाकर जैदी ने किया। कार्यक्रम में नरेश सक्सेना, संध्या सिंह, किरण सिंह, दिव्या शुक्ला, विजय पुष्पम पाठक, डॉ कैलाश निगम, एस.सी. ब्रह्मचारी, रामशंकर वर्मा, कौशल किशोर, अनीता श्रीवास्तव, नसीम साकेती, प्रताप दीक्षित, भगवान स्वरुप कटियार, एस के मेहँदी, डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव, प्रदीप सिंह कुशवाहा, हेमंत कुमार, मनोज शुक्ल, केवल प्रसाद सत्यम, धीरज मिश्र, हफीज किदवई, सूरज सिंह सहित कई अन्य गणमान्य व्यक्ति एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।

Monday 1 September 2014

हर वाटिका में हरियाली रहे

- अशोक पाण्डेय अशोक

मादकता की सुगंध सनी यदि बौरी रसाल की डाली न होती
मोहकता, मृदुता, मकरन्द से पूरित पंकज-प्याली न होती
प्रेम का पाठ पढ़ाती हुई मधुपों की कतार निराली न होती
तो फिर शायद पाकर घोर वियोग भी कोकिला काली न होती

छवि में उषा की रंग के, खुद को है सरोवर नीर ने हाला किया
रस लेने चले अलि भोर में तो जलजात ने है तन प्याला किया
अनुराग बसा सबमें, सभी ने मिल संयम का है दिवाला किया
चढ़ व्योम में होलिका-धूम ने प्रात, प्रभात का है मुख काला किया

दूर हुआ पतझार है, रूप अनूप से भावुकों का मन मोलो
डाल सुगन्ध समीरण में जन मानस में रस ही रस घोलो
है अलियों ने कहा कलियों सुनों, आयी बहार है चाव से डोलो
बोलो भले न, हँसों खुलके बंधी प्रेम-पराग की पोटली खोलो

धूल ही धूल को झोंकना भूल, असंख्य पलास-अँगार से भागा
दम्भ का दुर्ग ढहा पल में धरा छोड़ प्रसून-सँभार से भागा
जो पतझार डिगा न बबूल प्रहार से, मार की मार से भागा
कोकिल की ललकार से और प्रमत्त मिलिन्द-धमार से भागा

पहने तरुओं ने नए पट हैं, सजे साज दिशाओं की गोरियाँ हैं
किरणें न वसन्त-प्रभा सँग ले, उतरीं सुरलोक-किशोरियाँ हैं
मन बाँधने साधकों का शिखि ने लहरा दीं लताओं की डोरियाँ हैं
मकरन्द कटोरियाँ पुष्प लिए, कलिकायें सुगंध-तिजोरियाँ हैं

प्रति वृक्ष की झूमती डाली रहे, सजी वल्लरी माल निराली रहे
रस पूरित पाटल प्याली रहे, अलि पंक्ति बनी मतवाली रहे
कलिकाओं के आनन लाली रहे, विहगावली कूँजती आली रहे
              मन-मोद ले हर्षित माली रहे, हर वाटिका में हरियाली रहे          

Sunday 31 August 2014

यादें

दिन भर अपनी चमक से
कोना-कोना गरमाता
यह सूरज अब
धीरे-धीरे
अपनी गुफा की तरफ़ जाएगा
हौले से निकलता चाँद
फलक से
इस ढलती शाम पर

गहरा जाएगा
फिर से यादें तेरी
मुझे ले जाएँगी
ख़्वाबों के शहर में

और एक दिन का इन्तजार
फिर से एक उम्र में
ढल जाएगा !!
- ranju bhatia

Saturday 30 August 2014

वृंदा की अद्भुत छवि


         सुलोचना वर्मा

एक दिन मेरी कविता उकेर रही थी
वृंदा की अद्भुत छवि
जिसमें रंग उभर रहे थे तरह-तरह के
उसके अभिशाप और उसकी पवित्रता से जुड़े
प्रत्येक रंग का था अपना-अपना प्रश्न
जिनका उत्तर देने हेतु प्रकट होते हैं श्री कृष्ण
और उनके तन पर होती है- गुलाबी रंग की धोती
विदित है उन्हें- नहीं भाता है मुझको पीला रंग
यहाँ उनका वर्ण भी श्याम नहीं होता है
होता है गेहुआं- मेरी पसंद की मानिंद 

फिर होता है कुछ ऐसा कि
भनक पड़ जाती है राधा को उनके आने की
सरपट दौड़ आती है लिए अपने खुले काले केश
जिसे गूंथने लगते हैं बड़े ही जतन से राधारमण
राधा छेड़ देती है तान राग कम्बोज की
धरकर माधव की बांसुरी अपने अधरों पर

झूमने लगता है मेरे मन का श्वेत मयूर
मैं लीन हो जाती हूँ वंशी की उस धुन पर
कि तभी शोर मचाता है धर्म का एक ठेकेदार
लगाया जाता है आरोप मुझपर- तथ्यों से छेड़खानी का
पूछे जाते हैं कई प्रश्न धर्म के कटघरे में
माँगे जाते हैं कई प्रमाण मुझसे
गुलाबी धोती से लेकर, राधा के वंशीवादन तक
कृष्ण के वर्ण से लेकर, मन के श्वेत मयूर तक

मैं लेकर दीर्घ-निश्वास, रह जाती हूँ मौन 
और मेरे मौन पर मुखड़ हो उठती है मेरी कविता 
पूछती है धर्म के उस ठेकेदार से
कि जब पढ़ा था उसने सारा धर्मग्रन्थ
तो क्यूँ बस पढ़ा था उसने केवल शब्दों को
क्यूँ नहीं समझ पाया वह उनका अभिप्राय
प्रेम में कृष्ण भी कहाँ रह पाए थे केवल कृष्ण
उनके वस्त्र का गुलाबी होना प्रेम की सार्थकता थी
राधा ने माधव की वंशी से गाया- वही राग कम्बोज
कृष्ण प्रतीक हैं प्रेम का, और प्रेम का कोई वर्ण नहीं होता
जो कभी अपने अधूरे ज्ञान से झांककर देखोगे बाहर
जान पाओगे कि मयूर श्वेत भी होता है !!!

लौट जाता है कुंठा लिए धर्म का ठेकेदार
और  ढूँढने लगता है व्यस्त होकर
राग कम्बोज का उल्लेख- उन्ही धर्मग्रंथों में
अंतर्ध्यान हो जाते हैं राधा संग कृष्ण
रो देती है वृंदा इस पूरे घटनाक्रम पर
बह जाते हैं रंग उसकी अश्रुधार से 
अनुत्तरित रह जाते हैं मेरी कविता में
रंगों के तमाम प्रश्न
रंग- जिन्हें भरना था वृंदा की अद्भुत छवि को |

केदार के मुहल्ले में स्थित केदारसभगार में केदार सम्मान

हमारी पीढ़ी में सबसे अधिक लम्बी कविताएँ सुधीर सक्सेना ने लिखीं - स्वप्निल श्रीवास्तव  सुधीर सक्सेना का गद्य-पद्य उनके अनुभव की व्यापकता को व्...